शनिवार, मार्च 19, 2016

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के आड़ मे देशद्रोह !

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता किसके लिए केवल मुसलमानो के लिए या बामपंथ के नाम पर भटके हुए कुछ हिन्दुओ के लिए ?
अभिव्यक्ति के स्वतन्त्रता ,कला ,और क्रिकेट के नाम पर देश को गाली देना देश के वीरुध सड्यंत्र रचना और केवल और केवल सनातन धर्म को बदनाम करना ,हमारी संस्कृति को मिटा देने की चेष्टा करना !

कल्पना कीजिये क्या भारत मे कला के नाम पर भारत माता ,सरस्वतीमाता ,हनुमान जी की कार्टून या नंगी तस्वीर बन सकती है ,लेकिन क्या यहाँ का कोई कलाकार मुहमद पैगंबर को सूअर पर बैठा तस्वीर या कार्टून बना सकता है ?

स्वतन्त्रता है तो आप किसी व्यक्ति का विरोध करें किसी के विचार धारा का विरोध करें आप देश का विरोध कैसे कर सकते है अगर आप करते है तो ठीक वैसा ही है जैसे जिस थाली मे खाओ उसी थाली मे हगो !

और आज कल जो बुद्धिजीवी देशद्रोही प्रकरण पर अपने बुद्धि का प्रयोग कर के पर्दा डाल रहे है ,ये देशद्रोही मौका मिलते ही इनकी माँ बहन एक पहले करेंगे !

कश्मीर मे हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल पूरी दुनिया मे दी जाती थी ब्राह्मण और मुसलमानो का अजब भाई चारा ! लेकिन मौका मिलते ही मुसलमानो ने कश्मीरी पंडितो के साथ क्या किया हमे आप को बताने की जरूरत नहीं है !
देशद्रोही गतिविधि मे शामिल लोगो के साथ कोई न्यायालय मे न्याय नहीं सड़क पर न्याय करने की जरूरत है ! हमारी सहनशीलता को कायरता समझ बैठे है ऐसे पापी दुष्टो का  संहार करना अति आवश्यक है और इनको खाद पानी देने वाले बुद्धिजीवी ,पत्रकार ,मीडिया ,राजनेता की आँख फोड़ दी जाये ,कान कट लिया जाये ,नाक काट लिया जाये , हत्या नहीं ! क्यों की हत्या करने के बाद तो फांसी या उम्र कैद संभव है लेकिन सालो का हाथ पैर नाक कान काट लेने के बाद शायद 3 से 6 महीने मे जमानत या 2 ,4 साल का सजा हो जाएगा ! लेकिन हरामखोरों को सबक मिल जाएगा फिर तो इनके 10 पुश्त भी देशद्रोही गतिविधि मे दूर दूर तक शामिल नहीं होंगे !

शनिवार, अगस्त 29, 2015

औरंगजेब रोड.............

औरंगजेब रोड का नाम बदल कर रोड का नाम अब्दुल कलाम के नाम पर रखे जाने पर लोग अपनी पीठ और छाती ठोक रहा है समझ में आता है लेकिन हिन्दुत्वादी खुश क्यों हो रहे है ?
चुतियापा की हद हो गई ,सूअर के औलाद औरंगजेब का नाम मिटा कर छत्रपति शिवाजी महाराज ,श्री गुरु तेग बहादुर ,या श्री गुरु गोविन्द सिंह का नाम रखते तो हम समझते की आक्रमणकारी ,इस्लामिक आतंकी, जेहादी औरंगजेब के मरने के 308 साल बाद भी उसके मुंह पर थूक कर करारा तमाचा मारने की जज्बा रखते है !
लेकिन नहीं अपना शाशन तो फट्टू लोगो के हाथ में ही होती है फट्टू लोगो ने एक मुल्ले के नाम हटा कर एक मुल्ले का नाम पर ही रखा ताकि इन सालो को जबाब दे दे कर फट न जाए !
बेगानी शादी में अब्दुल्लाह दीवाना होए जा रहे है ...........अब्दुल के नाम रोड करने का जश्न तो ऐसे मना रहे है जैसे अपने मामा से रोड छीन कर अपने फूफा को दे दिया हो ...........
@ फालतू बकवास नहीं अंधभक्तो ...जयश्रीराम

सोमवार, अगस्त 03, 2015

चूतिये गांधीवादी का ईस्लामिक आतंकी प्रेम के चक्कर में अहिंसा राग़ !!!

डियर आल गिरगिट नस्ल के गांधीवादी ,
पिछले दिनों याकूब के फांसी के बाद देश के सेक्युलर हाराम्खोर ,कुत्तिजिवी (बुद्धिजीवी ) ,मिडिया ,मानवधिकारवादियों ,रिटायर जज ,कुत्ते नेता ,अधिवक्ता,गांधीवादी  और कई नश्ल के प्राणी याकूब मेनन के फांसी को -
गाँधी के कथन "आँख के बदले आँख नहीं " का कलमा सुना कर विरोध किया ,और फांसी माफ़ी  की  भीख मांगी .......वह भी हद तो तब हो गई जब फांसी के प्रक्रिया शुरू होने के दो घंटे पहले तक हारामी के पिल्लै कुछ बकील अपने एडी घिसते दिखे !

गाँधी ने अगर आँख के बदले आँख नहीं का फार्मूला दिया तो हाराम्खोरो गाँधीवादियों गाँधी के छाती पर जब श्री गोडसे ने गोली ठोकी तो गोडसे को फांसी पर क्यों चढ़ाया ?

जब देश में आतंकवादी हमले होते है जैसे मुंबई हमला ,गुरुदासपुर में हमला तुम साले गांधीवादी एंड गैंग वहां अहिंसा का पाठ पढ़ाने क्यों नहीं जाते जब आतंकी गोला और गोली बरसाते रहते है ?

कमीनो गाँधी और गाँधी के अहिंसावाद पर इतना ही घमंड है तो देश के सरहद पर गाँधी का फोटो टांग दो सालो ..सैनिक लगाने का क्या फायदा ? थाने में पुलिस के जगह पर दो चार गांधीवादि ही बैठ जाए !

गाँधीवादी की संख्या अधिक इसलिए है क्यों की क्रांति करी देशभक्त अपने ग्रुप में शामिल करने के लिए मोमबती पर हाथ रख कर सपथ दिलवाते थे और गाँधी चरखा से सूत कटवाता था .........अधिकतम लोगों को सूत काटने में आसानी लगता था और वह गाँधी के पिच्छे  हो लेते थे गाँधी अंग्रेजो का एजेंट ही था साला और आज कल के गांधीवादी इस्लामिक एजेंट बन चुके है ! गांधीवादी फार्मूला आतंकवादियों ,उग्रवादियों के साथ .......चुतियापा की हद तो तब होती है गांधीवादियों की जब अपने देश के सैनिक या वीर पुलिसकर्मी ,सुरक्षा वाल के सहादत पर साले कहीं अपना मुंह छुपा कर बैठ जाते है !
इनका प्यार आज कल  खास तौर से दंगाई मुल्ले ,मुल्ले आतंकी ,उग्रवादीयों के लिए ही उमड़ता है !!!

गुरुवार, अप्रैल 23, 2015

बाजः इच्छा, सक्रियता और कल्पना की प्रेरणा !!!!!!!!!!!


बाजः इच्छा, सक्रियता और कल्पना की प्रेरणा

बाज़ लगभग ७० वर्ष जीता है, पर अपने जीवन के ४०वें वर्ष में आते आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना

पड़ता है। उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं।
उसके पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है और शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं। चोंच आगे की

ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने

में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है। पंख भारी हो जाते हैं और सीने से चिपकने के कारण पूरे खुल नहीं पाते 

हैं,उड़ानें सीमित कर देते हैं। भोजन ढूढ़ना, भोजन पकड़ना और भोजन खाना, तीनों प्रक्रियायें अपनी धार 

खोने लगती हैं।

उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं, या तो देह त्याग दे, या अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन

पर निर्वाह करे, या स्वयं को पुनर्स्थापित करे, आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में। मन अनन्त,

जीवन पर्यन्त जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, तीसरा अत्यन्त पीड़ादायी और लम्बा।

बाज़ पीड़ा चुनता है और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है। वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, अपना घोंसला

बनाता है, एकान्त में और तब प्रारम्भ करता है पूरी प्रक्रिया। सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार

कर तोड़ देता है, अपनी चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं पक्षीराज के लिये। तब वह प्रतीक्षा

करता है चोंच के पुनः उग आने की। उ
सके बाद वह अपने पंजे उसी प्रकार तोड़ देता है और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने की। नये चोंच 

और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक एक कर नोंच कर निकालता है और प्रतीक्षा करता पंखों के 

पुनः उग आने की।
१५० दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा और तब कहीं जाकर उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान, पहले जैसी

नयी। इस पुनर्स्थापना के बाद वह ३० साल और जीता है, ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ।
प्रकृति हमें सिखाने बैठी है, बूढ़े बाज की युवा उड़ान में जिजीविषा के समर्थ स्वप्न दिखायी दे जाते हैं। अपनी

हों उन्मुक्त उड़ानें पंजे पकड़ के प्रतीक हैं, चोंच सक्रियता की द्योतक है और पंख कल्पना को स्थापित करते

हैं। इच्छा परिस्थितियों पर नियन्त्रण बनाये रखने की, सक्रियता स्वयं के अस्तित्व की गरिमा बनाये रखने

की, कल्पना जीवन में कुछ नयापन बनाये रखने की।

इच्छा, सक्रियता और कल्पना, तीनों के तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं, हममें भी, चालीस तक आते आते। हमारा

व्यक्तित्व ही ढीला पड़ने लगता है, अर्धजीवन में ही जीवन समाप्तप्राय लगने लगता है, उत्साह, आकांक्षा,

ऊर्जा अधोगामी हो जाते हैं। हमारे पास भी कई विकल्प होते हैं, कुछ सरल और त्वरित, कुछ पीड़ादायी।

हमें भी अपने जीवन के विवशता भरे अतिलचीलेपन को त्याग कर नियन्त्रण दिखाना होगा, बाज के पंजों की

तरह हमें भी आलस्य उत्पन्न करने वाली वक्र मानसिकता को त्याग कर ऊर्जस्वित सक्रियता दिखानी होगी,

बाज की चोंच की तरह। हमें भी भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त

उड़ाने भरनी होंगी, बाज के पंखों की तरह। १५० दिन न सही, तो एक माह ही बिताया जाये, स्वयं को

पुनर्स्थापित करने में।
जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही, बाज की तरह। बाज तब

उड़ानें भरने को तैयार होंगे, इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी।


साभार:राजनामा ब्लॉग /Praveen Arya ji 

शुक्रवार, अप्रैल 11, 2014

वैवाहिक जीवन ....कोंग्रेसियों मोदीजी को छोड़ इन्दिरा को समझो !!



मोदी के वैवाहिक जीवन पर उंगली उठाने वाले कोंग्रेसी ....अपनी अम्मा इन्दिरा गांधी के बारे मे क्या ख्याल है ?

इन्दिरा गांधी फिरोज खान से शादी की लेकिन इन्दिरा का टाइटल खान होने के जगह फिरोज का टाइटल गांधी हो गया !
दो बच्चे पैदा करवाने के बाद इन्दिरा गांधी अपने पति का घर छोड़ अपने ऐयास और अमीर बाप के घर दिल्ली चली गई , और अपने पति को ठुकरा दिया ,
फिरोज गांधी इन्दिरा गांधी का नाम का पति रह गया इन्दिरा जहां अपने बाप के सेवा सत्कार मे लगी थी वही फिरोज गांधी दिल्ली मे रहते हुए अकेला ज़िंदगी जिया न पत्नी न बेटा ...साथ था !...
और एक दिन ऐसा आया जब अपने बाप के साथ इन्दिरा विदेश घूम रही थी तब उसका पति फिरोज खान /गांधी घुट घुट कर मर गया दिल का दौरा पड़ने से .......!!!!
ये है काँग्रेस के महिलाओ का चरित्र ........
और 100 टंच माल कहने वाले पुरसों का चरित्र का क्या गुण गाँ करूँ ....जय श्री राम
अधिक विस्तृत जानकारी गूगल के माध्यम से ......नीचे पढे , धन्यबाद !!!!
महाद्वीप यूरोप और ब्रिटेन में रहते समय इन्दिरा गांधी की मुलाक़ात एक पारसी कोंग्रेसी  कार्यकर्ता, फिरोज़ गाँधी से हुई, और अंततः १६ मार्च १९४२ को आनंद भवन इलाहाबाद में एक निजी आदि धर्मं ब्रह्म-वैदिक समारोह में उनसे विवाह किया! 1944 में  फिरोज गांधी के साथ राजीव गांधीऔर इसके दो साल के बाद संजय गाँधी को जन्म दिया।
इन्दिरा और फिरोज  बाद में इलाहाबाद में बस गये, जहाँ फिरोज ने एक कांग्रेस पार्टी समाचारपत्र और एक बीमा कंपनी के साथ काम किया। उनका वैवाहिक जीवन प्रारम्भ में ठीक रहा, लेकिन बाद में जब इंदिरा अपने अमीर और रहीस बाप  के पास नई दिल्ली चली गयीं, उनके प्रधानमंत्रित्व काल में जो अकेले तीन मूर्ति भवन में एक उच्च मानसिक दबाव के माहौल में जी रहे थे, वे उनकी विश्वस्त, सचिव और नर्स बनीं। इन्दिरा गांधी अपने पति को छोड़  अपने बेटो के साथ प्रधानमंत्री निवाश मे वास करने लगी , और वो  अंततः फिरोज से स्थायी रूप से अलग हो गयीं, लेकिन  विवाहित का तगमा जुटा रहा।
जब भारत का पहला आम चुनाव 1951 में समीपवर्ती हुआ, इंदिरा अपने पिता एवं अपने पती जो रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़रहे थे, दोनों के प्रचार प्रबंध में लगी रही। फिरोज अपने प्रतिद्वंदिता चयन के बारे में नेहरू से सलाह मशविरा नही किया था, और यद्दपि वह निर्वाचित हुए, दिल्ली में अपना अलग निवास का विकल्प चुना। फिरोज ने बहुत ही जल्द एक राष्ट्रीयकृत बीमा उद्योग में घटे प्रमुख घोटाले को उजागर कर अपने राजनैतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाकू होने की छबि को विकसित किया, जिसके परिणामस्वरूप नेहरू के एक सहयोगी, वित्त मंत्री, को इस्तीफा देना पड़ा।
तनाव की चरम सीमा की स्थिति में इंदिरा अपने पती से अलग हुईं। हालाँकि सन् 1958 में उप-निर्वाचन के थोड़े समय के बाद फिरोज़ को दिल का दौरा पड़ा, जो नाटकीय ढ़ंग से उनके टूटे हुए वैवाहिक वन्धन को चंगा किया। कश्मीर में उन्हें स्वास्थोद्धार में साथ देते हुए उनकी परिवार निकटवर्ती हुई। परन्तु 8 सितम्बर,1960 को जब इंदिरा अपने पिता के साथ एक विदेश दौरे पर गयीं थीं, फिरोज़ की मृत्यु हुई।